सुप्रीम कोर्ट से पहले मायावती की सरकार ने SC-ST एक्ट के नियमों में बरती थी ढिलाई?

लखनऊ: अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम को कथित तौर पर शिथिल किए जाने के विरोध में देशभर में बवाल मचा हुआ है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में दलित संगठनों ने सोमवार (2 अप्रैल) को भारत बंद किया था. बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) प्रमुख मायावती लगातार यह आरोप लगा रही हैं कि केन्द्र सरकार SC-ST एक्ट को लेकर चिंतित नहीं हैं. मायावती खुद भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल खड़ी कर रही हैं, लेकिन इसी बीच Zee News के पास 2007 का यूपी सरकार का ऐसा आदेश है, जिसमें SC-ST एक्ट के नियमों में ढिलाई दी गई थी, जिसे मायावती ने अपने मुख्यमंत्री रहते हुए दिया था.

मायावती ने जैसे ही मई 2007 में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, उसके बाद 19 मई 2007 को यूपी सरकार के सभी वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक की और बैठक के बाद यूपी के तत्कालीन मुख्य सचिव ने यह आदेश दिया कि SC-ST Act के क्रियान्वयन में विशेष सावधानी बरती जाए. इस एक्ट का सहारा लेकर कतिपय लोग सरकार को बदनाम करने की कोशिश करेंगे. यह भी देखा गया है कि कभी-कभी दबंग व्यक्ति आपसी वैमनस्य के कारण प्रतिशोध की भावना से प्रेरित होकर अनुसूचित जाति के व्यक्ति को मोहरा बनाकर झूठा मुकदमा दर्ज करा देते हैं.

अत: ऐसे मामलों में अविलंब सत्यता की पुष्टि करने के बाद मुकदमा दर्ज किया जाए. SC-ST एक्ट का दुरुपयोग किसी भी दिशा में ना हो. छोटे छोटे मामलों का निस्तारण सामान्य एक्ट में किया जाए और गंभीर मामलों जैसे हत्या, रेप, जैसे मामलों में SC-ST एक्ट में मुकदमा दर्ज हो.

शासनादेश में स्पष्ट रूप से कही गई थी SC/ST एक्ट में पहले जांच की बात
यूपी के तत्कालीन मुख्य सचिव प्रशांत कुमार की ओर से जारी लिखिल शासनादेश में कहा गया था, ‘अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम को पूरी निष्ठा और अधिनियम की भावनाओं के अनुरूप लागू किया जाए. इस समाज के लोगों को उत्पीड़न की दिशा में त्वरित न्याय सुनिश्चित किया जाए. इस अधिनियम के अंतर्गत प्राप्त अपराध की सूचना के दर्ज होने के बाद गंभीरतापूर्वक अन्वेषण, परीक्षण और साक्ष्य के आधार पर विधिक कार्यवाही की जाए. हत्या, बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों में पुलिस अधीक्षक, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक स्वंय संज्ञान लेते हुए विवेचना, अन्वेषण, परीक्षण शीर्ष प्राथमिकता पर अपनी देखरेख में परा कराएं. अनुसूचित जाति और जनजाति के सदस्यों के उत्पीड़ने के मामले में त्वरित न्याय दिलाने के साथ-साथ यह भी ध्यान रखा जाए कि किसी निर्दोष व्यक्ति को अनावश्यक परेशान न किया जाए.’

इस आदेश में यह भी लिखा था कि अगर आरोप झूठा साबित हो तो आरोप लगाने वाले के खिलाफ धारा 182 के तहत कार्रवाई की जाए. तत्कालीन मायावती की सरकार में यह आदेश 29 अक्टूबर 2007 को जारी किया गया था.

अब ये कह रही हैं मायावती
बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा है कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) कानून, 1989 को निष्प्रभावी बनाने के खिलाफ देश भर में व्यापक आक्रोश है. मायावती ने मीडिया से बातचीत में कहा कि दलित और आदिवासी कर्मचारियों को मिलने वाले प्रमोशन में आरक्षण की सुविधा की तरह ही अब इस कानून को लगभग निष्क्रिय व निष्प्रभावी बना दिये जाने के खिलाफ देशभर में व्यापक आक्रोश है. ‘भारत बन्द’ जैसे आन्दोलनों की तीव्रता से मजबूर होकर ही केन्द्र सरकार द्वारा उच्चतम न्यायालय में काफी विलम्ब से आज पुनर्विचार याचिका दाख़िल की गई.

उन्होंने कहा कि सरकारी प्रयास केवल दिखावटी, नुमाइशी एवं गुमराह करने वाला नहीं होना चाहिये बल्कि पूरी तैयारी एवं मज़बूती से मामले की प्रस्तुति करके एससी-एसटी कानून को दोबारा उसे उसके असली रूप में तत्काल बहाल कराना चाहिये.

SC/ST Act

मायावती ने कहा कि अगर केन्द्र सरकार सम्बंधित मामले में समय पर उचित कार्रवाई करती तो ‘भारत बन्द’ की नौबत ही नहीं आती और ना ही कुछ ग़ैर-आन्दोलनकारी असामाजिक तत्वों को सरकारी लापरवाही के कारण आगजनी व हिंसा आदि करने का मौका मिलता.

उन्होंने कहा कि बीएसपी ‘भारत बन्द’ के दौरान हिंसक घटनाओं की तीव्र निन्दा करती है, लेकिन भाजपा सरकारों को इसकी आड़ में सरकारी जुल्म-ज्यादती करके लोगों को और भी ज्यादा भड़काने का प्रयास नहीं करना चाहिये. सरकार पूरी निष्पक्षता से काम करते हुये मृतकों व घायलों की उचित सहायता करे.

मायावती ने कहा, ‘वैसे तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा की विभिन्न राज्यों की सरकार में दलितों, आदिवासियों व पिछड़ों की बहुत ही ज़्यादा उपेक्षा हो रही है तथा इन्हें इनके संवैधानिक व कानूनी अधिकारों से भी वंचित रखने का षडयंत्र लगातार किया जा रहा है, परन्तु एससी-एसटी कानून, 1989 को पूरी तरह से प्रभावाहीन व बेअसर बना देने की प्रधानमंत्री मोदी और महाराष्ट्र की भाजपा सरकार की साज़िशों ने इन वर्गों के लोगों को काफी ज्यादा उद्वेलित व आन्दोलित कर दिया है. इसी वजह से दलितों और आदिवासियों ने मिलकर ‘भारत बन्द’ का आयोजन किया, जिसे हर तरफ व्यापक समर्थन मिला है.

मायावती ने कहा कि वह संसद में नहीं हैं तो क्या हुआ, संसद के बाहर की हमारी राजनीति और जीवन संघर्ष मोदी सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर करती रहेगी. उन्होंने कहा कि वैसे भी इन वर्गों के उपेक्षित एवं शोषित लोग पहले से ही सरकारी शह एवं संरक्षण के कारण जातिवादी हिंसा व उत्पीड़न से काफी ज्यादा परेशान थे, परन्तु इस सम्बंध में अत्याचार निवारण कानून को एक प्रकार से कागज का टुकड़ा बना देने से इनके सब्र का पैमाना छलक गया है और वे लोग भी किसानों की तरह ही सड़कों पर उतर आने को मजबूर हुए हैं.

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