भाजपा का ‘अंतरात्मा स्टाइल’, हर चुनाव में जोड़-तोड़ की सियासत

भारतीय राजनीति का ये ‘अंतरात्मा’ काल है. यहां अंतरात्मा की आवाज पर सरकारें बदल जाती हैं, तो नेता-विधायक पलटी मार जाते हैं. ये भाजपा का ही कमाल है कि दूसरी पार्टी का विधायक अंतरात्मा की आवाज पर सत्ता में विराजमान पार्टी को वोट देता है. इस दौर-ए-सियासत में निश्चित तौर पर अंतरात्मा, पार्टी, विचारधारा पर भारी नजर आती है.

‘अंतरात्मा ने बदलवाया वोट’

ताजा मामला यूपी का है, जहां राज्यसभा चुनाव के लिए वोट डाले जा रहे हैं. बीजेपी ने अपने 9वें उम्मीदवार को जिताने के लिए बीएसपी और सपा के वोटों में सेंध लगा दी है.

गुरुवार की रात हुई मुख्यमंत्री योगी की बैठक में बसपा विधायक अनिल सिंह भी पहुंचे. शुक्रवार की सुबह जब अनिल सिंह वोटिंग के लिए यूपी विधानसभा के तिलक हाल पहुंचे तो अंतरात्मा की दुहाई देते हुए बीजेपी को वोट देने की बात की.

राज्य में सत्तारुढ़ बीजेपी के लिए उपचुनाव में हार के बाद राज्यसभा में जीत साख का सवाल बन गई है. लिहाजा भगवा पार्टी ने इसके लिए पर्दे के पीछे से एड़ी चोटी का जोर लगा दिया. इसी कोशिश में उसने विपक्षी पार्टियों के विधायकों को अपने उम्मीदवारों के पक्ष में वोट करवाने का खेल अंतरात्मा को समर्पित कर दिया.

अनिल सिंह ने राज्यसभा चुनाव में मतदान करने से पहले अपनी ‘अंतरात्मा की आवाज’ की बात कही और बोले, ‘मैं अंतरात्मा की आवाज पर वोट डालूंगा, महाराजजी (योगी आदित्यनाथ) को वोट दूंगा.’ बसंत ऋतु में करवट लेने वाले अनोखे ‘अनिल’ की ‘अंतरात्मा की आवाज’ पर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि अगर कोई अंतरात्मा की आवाज पर वोट करे तो उसका स्वागत है.

जब इन नेताओं के लिए सर्वोपरि हुई अंतरात्मा

देश की राजनीति में ‘अंतरात्मा की आवाज’ पर सबसे बड़ा फैसला पिछले साल हुआ था. 2017 की जुलाई में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. इस्तीफा देने के बाद उन्होंने इसे ‘अंतरात्मा की आवाज’ के आधार पर लिया गया फैसला बताया था.

उस समय नीतीश, आरजेडी और कांग्रेस के साथ बिहार में सरकार चला रहे थे, लेकिन पर्दे के पीछे बीजेपी के साथ सांठगांठ होने के बाद उन्होंने यह गठबंधन तोड़ दिया और 24 घंटे के अंदर ही बीजेपी के साथ नई सरकार बना ली.

उन्होंने कहा था, ‘मैंने अपनी अंतरात्मा की आवाज पर इस्तीफा दे दिया. देखा कि कोई रास्ता नहीं है तो नमस्कार किया. लगा कि काम नहीं कर सकते हैं तो खुद को सत्ता से अलग कर लिया. मैंने त्यागपत्र दे दिया है. आगे क्या होगा, कब होगा, कैसा होगा. सब भविष्य पर छोड़ दिया जाए.’

कुछ ही घंटे के अंदर ही नीतीश ने बीजेपी के साथ मिलकर नई सरकार बना ली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर बिहार को विकास के साथ आने पर शुभकामनाएं दी.

इसी ‘अंतरात्मा की आवाज’ के नाम पर बिहार में जमकर राजनीति की जाती रही. 20 महीने तक साथ में शासन करने के बाद आरजेडी के कई नेता इसी आवाज के नाम पर सरकार पर सवाल दागते रहे.

अन्य दलों की अंर्तआत्मा

पिछले साल जून में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान ‘अंतरात्मा की आवाज’ की बात उस समय उठी थी जब यूपीए की ओर से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार मीरा कुमार ने अपने पक्ष में वोट डालने के लिए निर्वाचक मंडल से ‘अंतरात्मा की आवाज’ सुनने की अपील की थी.

उन्होंने सभी निर्वाचक मंडलों को लिखी चिट्ठी में कहा था कि निर्वाचक मंडल के पास इतिहास रचने का मौका है और वो सारे मतभेदों को भुलाकर ‘अंतरात्मा की आवाज’ सुनकर फैसला लें. लेकिन उनकी अपील का उन्हें कोई खास फायदा नहीं हुआ और एनडीए उम्मीदवार रामनाथ कोविंद चुनाव जीत गए.

सोनिया ने छोड़ा था PM पद

हालांकि इसी ‘अंतरात्मा की आवाज’ पर 2004 में कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री नहीं बनने का फैसला लिया. 2003 में कई राज्यों में कांग्रेस की करारी हार के बाद 2004 में आम चुनाव में उनकी अगुवाई में यूपीए को बहुमत मिला तो उन्होंने ‘अंतरात्मा की आवाज’ का हवाला देकर प्रधानमंत्री का पद स्वीकार करने से विनम्रता से तब मना कर दिया था.

उन्होंने कहा था ‘प्रधानमंत्री का पद पाना मेरा ध्येय नहीं है. मैं हमेशा सोचती थी कि यदि कभी मैं ऐसी स्थिति में आई जैसी आज है, मैं अपनी ‘अंतरात्मा की आवाज’ सुनूंगी. मैं पूरी विनम्रता से पद लेने से इनकार कर रही हूं.’

बहरहाल, राज्यसभा चुनावों में कई बार विधायकों को ‘अंतरात्मा की आवाज’ पर वोट डालने की छूट दी जाती है, लेकिन इससे पहले लोग अपने नफे-नुकसान का आंकलन भी जरूर करते हैं.

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