तेल निर्यातकों की मनमानी रोकने के लिए भारत चीन साथ-साथ

पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें अपने चार साल के उच्चतम स्तर पर हैं और इसकी मार दुनिया के उन चार बड़े कच्चे तेल के आयातक देशों भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया पर पड़ रही है जो एशिया में आते हैं. एक ओर तो कच्चा तेल सप्लाई करने वाले देशों की ओर से आपूर्ति में कमी की वजह से कीमतें बढ़ी हुई हैं वहीं एशियाई देशों पर इसकी दोहरी मार पड़ रही है क्योंकि ओपेक देश उन्हें तीन से चार डॉलर प्रति बैरल महंगी कीमतों पर कच्चे तेल की आपूर्ति करते हैं. ओपेक यानी तेल निर्यातक देशों के संगठन की स्थापना 1960 में हुई थी. 14 देशों के इस संगठन में शामिल तेल उत्पादक देश ये सोच कर साझा मंच पर आए कि वो आपूर्ति पर नियंत्रण बना कर क़ीमतें मनमुताबिक तय कर पाएंगे.

ओपेक के सदस्य देश हैं ईरान, इराक़, कुवैत, सऊदी अरब, वेनेज़ुएला, क़तर, इंडोनेशिया, लीबिया, संयुक्त अरब अमीरात, अल्जीरिया, नाईजीरिया, इक्वाडोर और अंगोला. भारत अपने ईधन की ज़रूरतों की पूर्ति के लिए 80 फ़ीसदी कच्चा तेल आयात करता है. वहीं चीन 50 फ़ीसदी तो जापान और दक्षिण कोरिया तो 100 फ़ीसदी कच्चा तेल आयात करते हैं. अप्रैल 2018 में भारत ने 45.1 लाख बैरल कच्चा तेल खरीदा है और ये पिछले साल की तुलना में 2.5 फ़ीसदी अधिक है. यानी भारत में तेल की खपत बढ़ रही है. भारत जिन देशों से कच्चा तेल आयात करता है उनमें इराक़, सऊदी अरब, ईरान, वेनेज़ुएला शामिल हैं. ये ओपेक के संस्थापक सदस्य देश भी हैं. कुल मिलाकर ओपेक देश भारत की ज़रूरत का 60 फ़ीसदी तेल सप्लाई करते हैं, लेकिन इस पर ‘एशियन प्रीमियम’ लगा कर. यानी एशियाई मुल्कों से ये प्रति बैरल तीन से चार डॉलर अधिक वसूलते हैं

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और ओपेक देशों की मनमानी से निपटने को लेकर एक बड़ी पहल करते हुए भारत ने चीन के साथ ऑयल बायर्स क्लब’ बनाने की संभावनाओं पर चर्चा की है ताकि तेल निर्यातक देशों के साथ क्रूड की कीमतों को लेकर मोलभाव किया जा सके. साथ ही ऑयल ब्लॉक में ओपेक का वर्चस्व कम करने के लिए अमरीका से ज़्यादा कच्चा तेल मंगाया जा सके. एनर्जी एक्सपर्ट और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े तेल के जितने आयातक हैं, उनमें भारत, चीन, दक्षिण कोरिया और जापान एशिया के बड़े आयातक हैं और इनका आयात ओपेक देशों से लगातार बढ़ रहा है. खास तौर पर मध्य पूर्व के देशों से. इसलिए इन देशों को मिलाकर एक क्लब बनाए जाने की बात हो रही है. जो कच्चे तेल के बड़े निर्यातकों जैसे इराक, सऊदी अरब, ईरान और रूस जैसे देशों से कच्चे तेल की कीमतों को लेकर बातचीत करेंगे.

तेल के आयात, प्रभाव को लेकर इस क्लब में ये देश आपस में बातचीत कर सकेंगे. चीन, जापान और दक्षिण अफ्रीका के अपने हित हैं. उनकी अपनी कूटनीति है. भारत का अपना नज़रिया है. सभी को एक मंच पर इकट्ठा करना बहुत मुश्किल है. प्रयास अच्छा है लेकिन ये कितना सफल हो सकेगा यह देखने वाली बात होगी. क्लब बन तो जाएगा, लेकिन ये अनौपचारिक होगा या औपचारिक होगा. कीमतें अधिक होती हैं तो इस तरह के सवाल उठते हैं लेकिन अगर कीमतें कम हो जाएगी तो इस प्रकार के प्रयास ठंडे बस्ते में चले जाते हैं. सोच अच्छी है लेकिन नई नहीं है. क्लब का मतलब अनौपचारिक है.

वैकल्पिक ऊर्जा आ गई लेकिन भारत के लिए तेल की ज़रूरतें आने वाले तीन सालों में कम नहीं रहेंगी. भारत के पास ईंधन उतना नहीं है, उसे इन्हीं देशों से इसे ख़रीदना होगा. चीन की स्थिति इतनी ख़राब नहीं है, लेकिन वो भी 50 फ़ीसदी कच्चा तेल आयात ही करता है. जापान और कोरिया तो 100 फ़ीसदी तेल आयात करते हैं. ऊर्जा का ये इतना बड़ा स्ट्रक्चर है, उसमें इतने साधारण तरीके से कूटनीति या ग्रुप बनाना आम तौर पर कामयाब नहीं होता है  मध्य पूर्व के देश भारत, चीन, जापान, और बाकी एशियाई देशों को दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में अधिक कीमतों पर तेल बेचते हैं.

तेल बेचने वाले देशों कहना है कि एशियाई देश उनके बेहद नज़दीक हैं और इस वजह से इन्हें बाकी देशों अमरीका और बाकी देशों  की तुलना में भाड़ा कम देना पड़ता है. ऐसे में इन्होंने भारत, जापान, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों को होने वाली सप्लाई पर एशियन प्रीमियम चार्ज करना शुरू किया. भारत और चीन इसे हटाने की मांग कर रहे हैं  ये देश पांच से सात बिलियन डॉलर तो सिर्फ़ एशियन प्रीमियम से ही कमा लेते हैं. आज सारा तेल मध्य-पूर्व देशों से नहीं आता है. पूरी दुनिया में केवल 40 फ़ीसदी तेल ही ओपेक देश सप्लाई कर रहे हैं. अब ऑस्ट्रेलिया, लैटिन अमरीका, कनाडा में तेल निकलता है. अमरीका खुद निर्यातक बन चुका है. कुल मिलाकर हालात बदल चुके हैं. ऐसे में एशियन प्रीमियम को हटाने की मांग तेज़ हो गई है.

भारत तेल का तीसरा सबसे बड़ा आयातक देश है. अमरीका तो अभी तेल के निर्यात के बाज़ार में आया है. भारत उनसे बहुत कम तेल मंगाता है, वहां से तेल लाने में बहुत वक्त लगता है. ईरान, इराक, सऊदी अरब, ओमान, जैसे देश भारत के नज़दीक भी हैं और पारंपरिक रूप से इनसे संबंध अच्छे भी रहे हैं. मध्य पूर्व में अमरीका का प्रभाव कम हो रहा है. आने वाले पांच-सात सालों में भारत की बात ज़्यादा सुनी जाएगी. आने वाले वर्षों में अमरीका का प्रभाव कम होगा, चीन की वो विश्वसनीयता नहीं बन सकी है जो वो चाहता है. कुल मिलाकर तेल के शतरंज की बिसात लगातार बदल रही है. तेल की कीमतों को लेकर बायर्स क्लब बनाने में सफलता कितनी मिलेगी ये चीन पर बहुत हद तक निर्भर करता है

भारत और चीन के एक साथ आने से न केवल एशियन प्रीमियम हट सकता है बल्कि इससे ज़्यादा भी कटौती हो सकती है. अगर ये दोनों देश बाहर के देशों थर्ड कंट्री में इकट्ठा होकर ऑयल फील्ड के लिए बिडिंग करें तो ये चीन के साथ ही भारत के लिए भी बहुत लाभदायक है भारत को तेल की ज़रूरत है. वो इसके लिए अमरीका पर निर्भर नहीं हो सकता क्योंकि जहां एक ओर अमरीका बड़ा उत्पादक है वहीं वो बड़ा आयातक भी है. ये दावा किया जाता है कि इराक पर उसने हमला भी तेल को लेकर ही किया था. ये भी कहा जाता है कि अमरीका ने तेल के लिए ही मध्य पूर्व में अपनी सेना बनाए रखा है.

बड़े निर्यातकों में यह धारणा आ रही है कि एशियन प्रीमियम ग़लत है, इसका समय लद चुका है, इसे आने वाले वक्त में तो हटना ही होगा. आने वाले दो तीन सालों में भारत की स्थिति और मजबूत होगी और अर्थव्यवस्था मजबूत होगा. वो बेहतर स्थिति में होगा इन सभी चीज़ों को लेकर. अब भारत बड़ा आयातक बन रहा है, लिहाजा वो बिजनेस सेंस को देखते हुए फायदा उठाने की स्थिति में आ रहा है  भारत का फ़ायदा ये है कि वो तेल की दुनिया में एशियन प्रीमियम को लेकर और तेल की कीमतों को लेकर लीडरशिप की भूमिका में आ रहा है.  तेल राजनीति में भारत एक नेता के तौर पर उभर रहा है. भारत की आवाज़ सुनी जा रही है. हमने अंकुश निकाल लिया है, उसको लगाने का प्रयास कर रहे हैं, बस इसमें सफलता का इंतज़ार है

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