ट्रेड वॉर: अमरीका और चीन की इस जंग में कौन पिसेगा?

दुनिया की दो सबसे ताक़तवर अर्थव्यवस्था चीन और अमरीका के बीच ट्रेड वॉर छिड़ने की आशंकाओं से अर्थशास्त्रियों और शेयर बाज़ारों में खलबली मची हुई है.

अमरीका ने चीन से आने वाले सामान पर टैरिफ़ (शुल्क) लगाने का फ़ैसला किया है. वहीं, चीन ने भी जवाबी कार्रवाई करने की धमकी दी है.

चीन ने कहा है कि वह किसी भी स्थिति के लिए तैयार है. लेकिन ट्रेड वॉर या संरक्षणवाद क्या है और ये आपको कैसे प्रभावित करता है?

अमरीका और चीन आमने-सामने
आख़िर ट्रेड वॉर क्या है?
ट्रेड वॉर को हिंदी में कारोबार के ज़रिए युद्ध कह सकते हैं. किसी दूसरे युद्ध की तरह इसमें भी एक देश दूसरे पर हमला करता है और पलटवार के लिए तैयार रहता है.

लेकिन इसमें हथियारों की जगह करों का इस्तेमाल करके विदेशी सामान को निशाना बनाया जाता है.

ऐसे में जब एक देश दूसरे देश से आने वाले सामान पर टैरिफ़ यानी कर बढ़ाता है तो दूसरा देश भी इसके जवाब में ऐसा ही करता है और इससे दोनों देशों में टकराव बढ़ता है.

इससे देशों की अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित होती हैं जिससे दोनों देशों के बीच राजनीतिक तनाव बढ़ता है.

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप मानते हैं कि ट्रेड वॉर आसान और बेहतर हैं और वह कर बढ़ाने के मुद्दे से भी नहीं पीछे हटेंगे.

लेकिन टैरिफ़ आख़िर क्या है?
टैरिफ़ टैक्स यानी कर का वो रूप होता है जो विदेशों में बनने वाले सामान पर लगता है.

सैद्धांतिक रूप से, विदेशी सामान पर कर बढ़ाने का मतलब ये होता है कि वह सामान महंगे हो जाएंगे और लोग उन्हें ख़रीदना कम कर देंगे.

ऐसा करने के पीछे मंशा ये होती है कि लोग विदेशी सामान की कमी या उनके दाम ज़्यादा होने की स्थिति में स्वदेशी सामान ख़रीदेंगे जिससे घरेलू अर्थव्यवस्था को फ़ायदा होता है.

ट्रंप ऐसा क्यों कर रहे हैं?
अमरीकी राष्ट्रपति 60 अरब डॉलर के चीनी माल पर टैरिफ़ लगाने जा रहे हैं.

अमरीका यह क़दम कथित तौर पर कई सालों से हो रही ‘इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी की चोरी’ के बदले में उठाने जा रहा है.

क्योंकि चीन पर इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी चुराने यानी उत्पादों की मौलिक डिज़ाइन और विचार आदि को चोरी करने के आरोप हैं.

व्हाइट हाउस ने कहा है कि उनके पास 1000 से ज़्यादा उत्पादों की सूची है जिन पर 25 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाया जा सकता है.

हालांकि, ऐसा होने से पहले कंपनियों को अपनी बात रखने का पूरा मौक़ा मिलेगा.

ट्रंप चीन के साथ ट्रेड डेफिसिट यानी व्यापारिक घाटे को कम करना चाहता है. राष्ट्रपति बनने से पहले भी ट्रंप चीन पर ग़लत व्यापारिक नीतियां अपनाने का आरोप लगाते रहे हैं.

ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार में अमरीका के व्यापारिक घाटे को ख़त्म करने की बात पुरजोर अंदाज़ में कही थी.

वह इस बात को मानते हैं कि ये अमरीका में होने वाले उत्पादन को नुक़सान पहुंचाता है. और वह कई बार ट्विटर पर इससे निपटने के लिए क़दम उठाए जाने की बात कह चुके हैं.

ट्रंप अपने इस क़दम से उत्पादक राज्यों जैसे ओहायो में मतदाताओं को लुभाने की कोशिश भी कर सकते हैं.

व्यापारिक घाटा क्या है?
दो देशों के बीच आयात और निर्यात में जो अंतर होता है उसे ट्रेड डेफिसिट या व्यापारिक घाटा कहते हैं.

अमरीका और चीन के बीच भारी ट्रेड डेफिसिट है. इसका मतलब ये है कि चीन अमरीका को भारी मात्रा में अपना सामान बेचता है, लेकिन अमरीका से काफ़ी कम मात्रा में सामान ख़रीदता है.

बीते साल ये अंतर 375 अरब अमरीकी डॉलर था.

ट्रंप इससे बिलकुल भी ख़ुश नहीं हैं. वह इस ट्रेड डेफिसिट को कम करना चाहते हैं और इसके लिए वह करों की मदद लेना चाहते हैं.

राष्ट्रपति को ट्रेड डेफिसिट पसंद नहीं है, लेकिन ये उतनी भी ख़राब चीज़ नहीं है.

कई धनी देश हाल के दिनों में उत्पादक देशों से सेवाक्षेत्र में अव्वल देशों में एक हो गए हैं.

अमरीका ने 2017 में 242 अरब डॉलर की सेवाओं का निर्यात किया जो बैंकिंग, ट्रेवल और टूरिज़म के क्षेत्र में थीं.

अमरीकी अर्थव्यवस्था में सर्विस सेक्टर का योगदान 90 फ़ीसदी है. वहीं, चीन अपने उत्पादन में अव्वल है.

ऐसे में ट्रंप की ट्रेड डेफिसिट वाली बात लोगों को कम समझ में आती है, क्योंकि आलोचक ट्रंप प्रशासन के इस बयान को संरक्षणवाद की तरह देखते हैं.

संरक्षणवाद क्या है?
जब सरकार अपने देश के उद्योगों को बढ़ाने के लिए विदेशी सामानों पर कई तरह की पाबंदियां लगाती हैं तो सरकार के इस क़दम को संरक्षणवाद कहते हैं.

ट्रंप ने स्टील और एल्युमिनियम के क्षेत्र में टैरिफ़ लगाया है.

मार्च की शुरुआत में चीन के ख़िलाफ़ अपने हालिया क़दम से पहले ट्रंप ने सभी स्टील आयात पर 25 टैरिफ और एल्युमिनियम पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाया था.

ट्रंप प्रशासन का दावा है कि अमरीका धातुओं के लिए दूसरे देशों पर ज़्यादा निर्भर है और अगर युद्ध छिड़ जाता है तो अपनी इंडस्ट्री की मदद से पर्याप्त हथियार नहीं बना सकेगा.

लेकिन आलोचकों का कहना है कि अमरीका अपना ज़्यादातर स्टील कनाडा और यूरोपीय संघ से लेता है जो अमरीका के पक्के दोस्त हैं.

सैद्धांतिक रूप से विदेशी स्टील और एल्युमिनियम पर टैरिफ लगाने से अमरीकी कंपनियां स्थानीय कंपनियों से स्टील ख़रीदेंगी.

ऐसा माना जा रहा है कि इससे अमरीका की स्टील और अल्युमिनियम इंडस्ट्री को फ़ायदा होगा. क्योंकि ज़्यादातर कंपनियां देशी कंपनियों से ये उत्पाद ख़रीदेंगी. इससे स्टील और एल्युमिनियम के उत्पादों को फायदा होगा.

लेकिन क्या ये सच में काम करेगा?
ये संभव है कि इससे अमरीकी स्टील कंपनियों को फ़ायदा पहुंचे जिससे नई नौकरियां पैदा होंगी.

लेकिन कार और हवाई जहाज बनाने वाली कंपनियों, जिन्हें कच्चे माल की ज़रूरत होती है, के उत्पादों की क़ीमत बढ़ सकती है.

इसका मतलब ये है कि कंपनियों को अपने अंतिम उत्पाद पर दाम बढ़ाने होंगे. इससे आम उपभोक्ताओं को नुक़सान होगा.

ऐसे में अमरीका में कारों, गैजेट्स, प्लेन टिकट और बीयर के दामों में भी बढ़ोतरी हो सकती है.

आपको कैसे प्रभावित करेगा ये टैरिफ?

अमरीका का ये क़दम पूरी दुनिया को प्रभावित कर सकता है, क्योंकि चीन ने भी इस क़दम का जवाब देने का फ़ैसला किया है.

दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन अमरीकी कृषि और इंडस्ट्रियल उत्पादों जैसे सोयाबीन, पोर्क, कॉटन, एयरोप्लेन, कार और स्टील पाइपों पर कर लगाने की योजना बना रही है.

सैद्धांतिक रूप से चीन अमरीकी तकनीकी कंपनियां जैसे ऐपल पर भी कर लगा सकता है जिससे ऐपल के उत्पादों के दाम बढ़ सकते हैं.

फिलहाल, स्टील पर कर से यूरोपीय संघ, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील, कनाडा, मेक्सिको और दक्षिण कोरिया को राहत है. लेकिन वैश्विक ट्रेड वॉर से दुनिया भर में कंपनियों के लिए काम करना मुश्किल होगा और उन्हें अपने उत्पादों के दाम बढ़ाने होंगे.

ऐसे में क्या मुक्त व्यापार बेहतर है?
इस सवाल का जवाब इस पर निर्भर करता है कि आप किससे पूछ रहे हैं. मुक्त व्यापार संरक्षणवाद का उल्टा है. इसका मतलब है कि उत्पादों पर कम से कम कर लगाए जाएं जिससे लोग दुनियाभर में कहीं से भी बेहतर उत्पाद ख़रीद सकें वो भी कम दाम में.

इससे उन कंपनियों को फ़ायदा होता है जो लागत कम करने की कोशिश करती हैं. और इससे दुनिया की अर्थव्यवस्था को फ़ायदा हुआ है.

मुक्त व्यापार ने कार, स्मार्ट फोन, खाद्य उत्पादों से लेकर फूलों जैसी चीज़ों को आपके घर तक पहुंचाया है.

लेकिन इसका सीधा मतलब ये है कि ऐसे उत्पाद बनाने वाली कंपनियां देशी कंपनियों से कच्चा माल कम ख़रीदती हैं.

लेकिन अगर विदेशी सामान सस्ते में उपलब्ध हो तो तो स्वदेशी उत्पाद क्यों ख़रीदा जाए.

इसका असर ये होता है कि समृद्ध देशों में नौकरियों की कमी होती है और असामान्य वृद्धि होती है. हालांकि, फ्री ट्रेड ने कुछ लोगों को अमीर बनाया है लेकिन इसने कई लोगों को ग़रीब भी बनाया है.

आख़िर कैसे ख़त्म होगा ट्रेड वॉर?
इस बारे में किसी को नहीं पता है. इतिहासकारों के मुताबिक़, बढ़ा हुआ कर अक्सर उपभोक्ताओं के लिए सामान की क़ीमत बढ़ाता है. वहीं, अर्थशास्त्री ट्रंप प्रशासन के इस क़दम के ख़िलाफ़ हैं.

रिपब्लिकन पार्टी भी इस मुद्दे पर ट्रंप के ख़िलाफ़ है क्योंकि वह मुक्त व्यापार का समर्थक है.

ट्रंप द्वारा चीन के ख़िलाफ़ क़दम उठाने से दोनों देशों समेत दुनियाभर के उपभोक्ताओं को नुक़सान होगा.

दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच ट्रेड वॉर किसी के लिए बेहतर संकेत नहीं देता.

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