ट्रंप की नई चाल, चीन पर फेंका 50 अरब डॉलर का ‘ट्रेड वार’ बम

वाशिंगटन ।  उत्तर कोरियाई शासक किम जोंग उन के साथ शिखर वार्ता कर दुनियाभर में सुरक्षा और शांति का माहौल बनाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तीन दिन बाद ही एक नई जंग छेड़ दी है। उन्होंने शुक्रवार को चीन से आयातित 50 अरब डॉलर मूल्य के उत्पादों पर 25 फीसद आयात शुल्क का अनुमोदन कर ग्लोबल ट्रेड वार की शुरुआत कर दी। चीन ने अमेरिका के इस फैसले को एकतरफा बताते हुए जल्द ही जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है। ट्रंप के इस फैसले से न केवल दुनिया की दो आर्थिक महाशक्तियां आमने-सामने आ गई हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी कारोबारी असंतुलन का खतरा पैदा हो गया है। ग्लोबल ट्रेड वार से जहां बेरोजगारी बढ़ेगी वहीं आर्थिक विकास भी प्रभावित हो सकता है।

अमेरिका का कहना है कि चीन पर लगाया गया नया आयात शुल्क एशियाई देश द्वारा अमेरिकी कंपनियों की बौद्धिक संपदा की चोरी का जवाब है। शुल्क लगाने से पहले ट्रंप ने अमेरिकी वाणिज्य मंत्री विल्बर रॉस, वित्त मंत्री स्टीवन न्यूचिन और अमेरिका के कारोबार प्रतिनिधि रॉबर्ट लाइटहाइजर के साथ डेढ़ घंटे तक बैठक की थी। अपने बयान में ट्रंप ने कहा कि यह शुल्क उन उत्पादों पर लगाया गया है, जिनके लिए ‘उद्योग के लिहाज से महत्वपूर्ण तकनीकों’ का इस्तेमाल होता है। उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देशों के बीच लंबे समय से कारोबार में असंतुलन रहा है और अब यह असहनीय है।

अमेरिका ने इस कदम से चीन की उस ‘मेड इन चाइना 2025 योजना पर बड़ी चोट की है, जिसके तहत चीन अपने आर्थिक विकास के लिए उभरते बाजारों में तकनीक आधारित उद्योग में प्रभावी पैठ बनाना चाहता है। ट्रंप के इस कदम पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता जेंग शुआंग ने कहा, ‘अगर अमेरिका एकतरफा संरक्षणवादी रवैया अपनाता है और हमारे हितों को नुकसान पहुंचाता है, तो हम तत्काल प्रभावी कदम उठाएंगे।

इस वर्ष मार्च में जब अमेरिका ने चीन से आयातित 50 अरब डॉलर मूल्य के उत्पादों पर आयात शुल्क लगाने की बात की थी, तो इसके जवाब में चीन ने भी अमेरिका से आयातित इतने ही मूल्य के कार, हवाई जहाज और सोयाबीन जैसे उत्पादों पर आयात शुल्क लगाया था। उसके बाद अमेरिका ने 100 अरब डॉलर के चीनी आयात पर शुल्क लगाने की बात कही थी। दिलचस्प यह है कि दोनों देशों के बीच यह मामला सुलझाने के लिए पिछले महीने तक लगातार बैठकों का दौर चला था। इसके बाद दोनों देशों ने यह मामला सुलझा लेने का दावा किया था।

पिछले सप्ताह जी-7 मीटिंग में भी कनाडा, फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे सहयोगी देशों ने अमेरिका द्वारा स्टील व एल्यूमिनियम उत्पादों पर आयात शुल्क लगाने का फैसला वापस लेने का अनुरोध किया था। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष आइएमएफ की प्रमुख क्रिस्टीन लागार्ड ने गुरुवार को अमेरिका को चेताया था कि एकतरफा आयात शुल्क लगाने से अमेरिका के ही हित प्रभावित होंगे। ट्रंप ने अमेरिकी उत्पादों पर आयात शुल्क लगाने और बढ़ाने के भारत के फैसले की भी पिछले दिनों आलोचना की थी। जी-7 की मीटिंग में अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा था कि वे भारत से आयातित उत्पादों पर भी शुल्क बढ़ाने की तैयारी कर रहे हैं।

ट्रेड वार यानी व्यापार की लड़ाई दरअसल संरक्षणवाद का परिणाम है। अगर कोई देश किसी अन्य देश के साथ कारोबार पर कर या शुल्क बढ़ा देता है और बदले में पीडि़त देश भी ऐसा ही कदम उठाता है तो ट्रेड वार माना जाता है। दो बड़े देशों के बीच कारोबार में ऐसी तनातनी दुनियाभर में व्यापारिक तनाव पैदा कर सकती है। हालांकि अधिकतर देश अपने उद्योग को बचाने के लिए इस तरह के शुल्क लगाते हैं। इसीलिए इसे संरक्षणवाद कहा जाता है।

रुपये में गिरावट का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। शुक्रवार को डॉलर के मुकाबले रुपया एक बार फिर 68 के स्तर पर पहुंच गया है। इसमें 40 पैसे की भारी गिरावट दिखी है। फिलहाल डॉलर के मुकाबले रुपया 68.02 के स्तर पर है। इस सप्ताह बुधवार को अमेरिकी केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी की, जिसके चलते डॉलर में मजबूती दिख रही है। रुपये के कमजोर होने से तेल कंपनियों के लिए कच्चा तेल आयात करना महंगा साबित होगा। इससे पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़नी शुरू हो सकती हैं। पेट्रोल और डीजल के अलावा मोबाइल फोन, टेलीविजन और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे आयातित उत्पाद महंगे हो सकते हैं। हालांकि रुपये में गिरावट का फायदा यह होगा कि भारत से निर्यात के बदले बेहतर दाम मिलेंगे। भारत से च्यादातर इंजीनियरिंग गुड्स, जेम्स एंड च्वैलरी, टेक्सटाइल और कई अन्य उत्पादों का निर्यात होता है।

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