विश्व जल दिवस: पानी नहीं मिलने पर किस तरह होती है मौत?

हर साल 22 मार्च के दिन विश्व जल दिवस मनाया जाता है। लोगों के बीच पानी से संबंधिक चुनौतियों को लेकर जागरूकता बढ़े, इसलिए संयुक्त राष्ट्र ने इस दिवस की घोषणा की थी। सोशल मीडिया पर इससे जुड़े कई सवाल अक्सर पूछे जाते हैं, जिनमें से एक सवाल है कि पानी के बिना इंसान कितने दिन तक जिंदा रह सकता है?
ज्यादा से ज्यादा कितने दिन?

कई लोकप्रिय आर्टिकलों का निचोड़ निकालकर, गूगल इसका जवाब देता है कि एक मनुष्य करीब बीस दिन तक खाने के बिना तो रह सकता है। लेकिन पानी के बिना तीन-चार दिन से ज्यादा जीना बहुत मुश्किल है। जबकि अमरीका में बायोलॉजी के प्रोफेसर रेंडल के पैकर कहते हैं कि इसका जवाब इतना सीधा नहीं हो सकता। मसलन, गर्म मौसम में बंद कार के भीतर बैठा बच्चा और गर्मी में खेल रहा एक एथलीट पानी नहीं मिलने पर कुछ ही घंटों में मर सकते हैं।

पानी का बैलेंस

पर ऐसा क्यों होता है? इसका एक ही जवाब है डी-हाईड्रेशन। यानी शरीर में पानी की कमी होना। ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस के अनुसार, डी-हाईड्रेशन वो अवस्था है जब आपका शरीर पानी की जितनी मात्रा छोड़ रहा होता है, पानी की उतनी मात्रा उसे मिल नहीं रही होती। छोटे बच्चों और बुजुर्गों को डी-हाईड्रेशन से सबसे ज्यादा खतरा होता है। और सही वक्त पर इसपर ध्यान नहीं दिया जाए, तो ये जानलेवा हो सकती है।

पानी न मिलने पर कैसे आती है मौत?

शरीर में पानी की कमी होने पर सबसे पहले मुंह सूखता है। प्यास लगने लगती है। ये है डी-हाईड्रेशन की पहली निशानी। इसके बाद पेशाब का रंग गहरा पीला होने लगता है। उसमें दुर्गंध बढ़ जाती है। डॉक्टरों के अनुसार, ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पानी की कमी होने पर ख़ून में शुगर और नमक (सोडियम) का बैलेंस खराब हो जाता है।

कुछ घंटे बाद आपको थकान महसूस होने लगती है। बच्चे रोते हैं तो उनके आंसू आने बंद हो जाते हैं। अगले कुछ घंटों में पेशाब की मात्रा एकदम से घट जाती है। कुछ लोगों को चक्कर आने लगते हैं और आंखें थकान महसूस करने लगती हैं। दूसरे दिन शरीर मुंह में थूक बनाने की ज्यादा कोशिशें करने लगता है। होंठ सूखने लगते हैं और आंखों में दर्द होता है। दूसरे दिन बहुत ज्यादा नींद आती है। शरीर हर कीमत पर पानी बचाने की कोशिशें करने लगता है।

शुगर के मरीज, दिल के मरीज और डायरिया के शिकार लोगों में ये सारे लक्षण और भी जल्दी दिख सकते हैं। साथ ही ज़्यादा शराब पीने वाले और 38 डिग्री तापमान में काम कर रहे लोगों की भी हालत तेजी से बिगड़ती है। दूसरे दिन के अंत तक पेशाब का अंतराल आठ घंटे से ज्यादा हो जाता है। प्लस रेट बढ़ जाता है। त्वचा पर पानी की कमी साफ दिखने लगती है। कुछ लोगों को दौरे पड़ने लगते हैं। लोगों को दिखाई देना बंद हो जाता है या धुंधला दिखाई देने लगता है। कमजोरी इतनी बढ़ जाती है कि खड़े होने में भी दिक्कत होने लगती है। हाथ-पैर ठंडे पड़ने लगते हैं।

पानी है बहुत जरूरी

ये स्थिति खतरनाक है। इसके बाद किसी की भी मौत हो सकती है या इलाज मिलने के बाद भी डॉक्टरों के लिए मरीज को बचाना चुनौती भरा हो सकता है। मरीज के आसपास तापमान कितना है, उसे क्या बीमारी है और उसे अपने शरीर को कितना हिलाना-डुलाना पड़ रहा है, इससे भी मरीज की स्थिति तय होती है। डॉक्टरों की मानें, तो दिन में जितनी बार खाना खाएं, उतनी बार कम से कम पानी जरूर पियें। कम पानी पीने से किडनी से जुड़ी समस्याएं होने की संभावना बढ़ जाती है। पाचन ख़राब होता है और खून की क्वालिटी बिगड़ती है।

पानी के लिए मारामारी!

22 मार्च 2018: जल दिवस के दिन संयुक्त राष्ट्र ने एक दस वर्षीय एक्शन कैंपेन की भी शुरुआत की है, जिसका लक्ष्य लोगों को सूखे, बाढ़ और पानी से जुड़े अन्य जोखिमों के बारे में जानकारी देना होगा कुछ वक्त पहले ही ग्यारह ऐसे शहरों की एक सूची जारी की जा चुकी है जहां पीने का पानी या तो जरूरत से काफी कम बचेगा या खत्म ही हो जाएगा। इस लिस्ट में दक्षिण भारतीय शहर बेंगलुरु का भी नाम शामिल था। यूएन के एक अनुमान के मुताबिक, साल 2030 तक साफ पानी की डिमांड 40 फीसदी तक बढ़ सकती है। ऐसे में पानी के लिए सही मैनेजमेंट नहीं किया गया तो इसके लिए मारामारी बढ़ना लाजिमी होगा।

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