25 KVA ट्रांसफार्मर शिफ्टिंग मामले में आरोप पत्र, विभागीय जांच और निलंबन के बाद हाईकोर्ट के हस्तक्षेप से बदला घटनाक्रम; अब बहाली के बाद पूरे सिस्टम की कार्यशैली पर सवाल।
नोएडा। पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (PVVNL) के नोएडा क्षेत्र में सामने आए 25 KVA ट्रांसफार्मर शिफ्टिंग प्रकरण ने बिजली विभाग की प्रशासनिक कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। पहले विभागीय जांच, फिर आरोप पत्र, उसके बाद अवर अभियंता (JE) का निलंबन, इलाहाबाद हाईकोर्ट का हस्तक्षेप और अंततः बहाली—पूरे घटनाक्रम ने यह बहस तेज कर दी है कि विभाग में नियमों का पालन हो रहा है या प्रशासनिक निर्णय मनमाने तरीके से लिए जा रहे हैं।
AWAZ PLUS को उपलब्ध विभागीय दस्तावेजों के अनुसार सेक्टर-168 स्थित प्राथमिक विद्यालय गुलावली के पास स्थापित 25 KVA ट्रांसफार्मर एवं डबल पोल को बिना सक्षम विभागीय अनुमति स्थानांतरित किए जाने की शिकायत प्राप्त हुई थी। शिकायत के बाद विभागीय जांच कराई गई, जिसमें प्रथम दृष्टया अनियमितता पाए जाने पर संबंधित अवर अभियंता सचिन वर्मा को आरोप पत्र जारी कर स्पष्टीकरण मांगा गया।
जांच में उठे गंभीर सवाल
विभागीय जांच के दौरान यह पाया गया कि ट्रांसफार्मर स्थानांतरण निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप नहीं किया गया। सामान्यतः इस प्रकार के कार्य के लिए तकनीकी स्वीकृति, प्रशासनिक अनुमति और विभागीय प्रक्रिया का पालन आवश्यक होता है। जांच के आधार पर आरोप पत्र जारी होना इस बात का संकेत था कि विभाग ने मामले को गंभीर माना।
आरोप पत्र में सोशल मीडिया से प्राप्त शिकायत, जांच रिपोर्ट, फोटोग्राफ, लॉगबुक एवं अन्य अभिलेखों का भी उल्लेख किया गया। अधीक्षण अभियंता (तकनीकी) ने अधिशासी अभियंता को निर्देश दिए कि आरोप पत्र का विधिवत अनुपालन कर संबंधित अधिकारी से जवाब प्राप्त किया जाए और नियमानुसार विभागीय कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
निलंबन बना पूरे विवाद का केंद्र
जांच के बाद अधीक्षण अभियंता (तकनीकी) ने संबंधित अवर अभियंता को निलंबित कर दिया। हालांकि, यही आदेश आगे चलकर पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु बन गया।
मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा, जहां यह प्रश्न उठा कि UPPCL Employees (Disciplinary & Appeal) Regulations, 2020 के तहत अधीक्षण अभियंता को अवर अभियंता को निलंबित करने का अधिकार था या नहीं।
न्यायालय में ऐसा कोई रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया जा सका जिससे यह स्पष्ट हो कि अधीक्षण अभियंता को इस संबंध में अधिकार प्रत्यायोजित (Delegation) किया गया था। इसके बाद हाईकोर्ट ने निलंबन आदेश पर अंतरिम रोक लगाते हुए सक्षम प्राधिकारी को विधि के अनुसार आगे कार्रवाई करने की स्वतंत्रता प्रदान की।
महत्वपूर्ण बात यह रही कि न्यायालय ने ट्रांसफार्मर शिफ्टिंग के आरोपों पर कोई टिप्पणी नहीं की, बल्कि केवल निलंबन आदेश की वैधानिकता पर सवाल उठाया।
बहाली के बाद और गहरे हुए सवाल
हाईकोर्ट की कार्यवाही के बाद विभाग ने संबंधित अवर अभियंता की बहाली करते हुए उन्हें कार्यालय से संबद्ध (अटैच) कर दिया। लेकिन इस कार्रवाई के बाद कई नए प्रश्न सामने आ गए—
- यदि निलंबन आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर था, तो उसे जारी क्यों किया गया?
- यदि विभागीय जांच सही थी, तो अंतिम निर्णय तक मामला क्यों नहीं पहुंचा?
- यदि जांच में त्रुटि थी, तो आरोप पत्र जारी करने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
- क्या जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी समीक्षा हुई?
इन सवालों का अब तक कोई स्पष्ट आधिकारिक उत्तर सामने नहीं आया है।
मुख्य अभियंता की भूमिका पर भी उठे सवाल
विभागीय दस्तावेजों के अनुसार मामले में जांच और आरोप पत्र की प्रक्रिया आगे बढ़ी, लेकिन अंतिम निष्कर्ष सार्वजनिक नहीं हुआ। ऐसे में विभागीय हलकों में यह चर्चा लगातार बनी हुई है कि—
- जांच रिपोर्ट पर अंतिम निर्णय क्या हुआ?
- क्या वरिष्ठ स्तर पर स्वतंत्र समीक्षा कराई गई?
- क्या विभागीय कार्रवाई नियमानुसार पूरी की गई?
- क्या पूरे प्रकरण में पारदर्शिता बरती गई?
सेक्टर-31 ट्रांसफार्मर प्रकरण ने बढ़ाई चिंता
इसी दौरान सेक्टर-31 स्थित पावर ट्रांसफार्मर से जुड़ा एक अन्य मामला भी चर्चा में आया, जिसमें रखरखाव और निगरानी व्यवस्था को लेकर सवाल उठे। यदि किसी बड़े पावर ट्रांसफार्मर के संचालन या मरम्मत में अनियमितता हुई, तो उसकी जानकारी किस स्तर तक थी और यदि जानकारी थी तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई—यह भी जांच का विषय बन गया है।
AWAZ PLUS INVESTIGATION
अवर अभियंता (JE)
- बिना अनुमति ट्रांसफार्मर शिफ्टिंग का आरोप।
- विभागीय जांच।
- आरोप पत्र जारी।
- निलंबन।
- हाईकोर्ट में चुनौती।
- बाद में बहाली और कार्यालय अटैचमेंट।
अधीक्षण अभियंता (SE)
- निलंबन आदेश जारी किया।
- वही आदेश हाईकोर्ट में अधिकार क्षेत्र के विवाद का विषय बना।
- न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद विभाग को आदेश में बदलाव करना पड़ा।
मुख्य अभियंता
- पूरे प्रकरण की प्रशासनिक निगरानी।
- विभागीय जांच के अंतिम निष्कर्ष पर उठते सवाल।
- पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर चर्चा।
AWAZ PLUS के बड़े सवाल
🔴 यदि विभागीय जांच सही थी तो अंतिम कार्रवाई क्या हुई?
🔴 यदि निलंबन आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर था, तो संबंधित अधिकारी की जिम्मेदारी क्यों तय नहीं हुई?
🔴 क्या विभागीय नियमों से ऊपर व्यक्तिगत निर्णय प्रभावी रहे?
🔴 क्या नोएडा में विभागीय जवाबदेही सभी स्तरों पर समान रूप से लागू होती है?
🔴 क्या पूरे प्रकरण की स्वतंत्र और निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच कराई जाएगी?
अब निगाहें प्रबंध निदेशक पर
पूरा मामला अब पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (PVVNL) के प्रबंध निदेशक के समक्ष नैतिक और प्रशासनिक चुनौती बनकर खड़ा है। विभागीय जांच, आरोप पत्र, हाईकोर्ट के आदेश और बाद की कार्रवाई को देखते हुए यह अपेक्षा की जा रही है कि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष समीक्षा कर यह स्पष्ट किया जाएगा कि किस स्तर पर क्या चूक हुई और उसके लिए कौन जिम्मेदार है।
यदि विभाग वास्तव में पारदर्शिता और जवाबदेही की नीति पर कार्य करना चाहता है, तो जांच केवल अधीनस्थ कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जहां भी नियमों का उल्लंघन हुआ हो—चाहे वह किसी भी स्तर पर हो—वहां जवाबदेही तय होना विभाग की विश्वसनीयता और उपभोक्ताओं के विश्वास, दोनों के लिए आवश्यक है।
(नोट: यह समाचार उपलब्ध विभागीय दस्तावेजों, अभिलेखों और न्यायालय में हुई कार्यवाही के आधार पर तैयार किया गया है। संबंधित पक्ष का आधिकारिक पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।)
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