पूर्वांचल डिस्कॉम में ₹10.34 लाख की वसूली, ट्रांसफार्मर मामलों में निलंबन की गाज; लखनऊ में 56 मिनट का ब्लैकआउट और 569 भार का मामला, फिर बड़े अधिकारियों की जवाबदेही कहां?
लखनऊ | UPPCL MEDIA की विशेष पड़ताल
उत्तर प्रदेश का ऊर्जा विभाग भी गजब है! कहीं ट्रांसफार्मर खराब हुआ तो जेई से जवाब मांग लिया गया, कहीं ट्रांसफार्मर बदलने में देरी हुई तो निलंबन की कार्रवाई हो गई, कहीं रखरखाव में लापरवाही सामने आई तो अभियंताओं के वेतन से लाखों रुपये की वसूली का आदेश जारी हो गया।
लेकिन जब मामला कई बिजलीघरों की आपूर्ति बाधित होने, 56 मिनट के ब्लैकआउट और 569 भार से जुड़े कथित राजस्व नुकसान का सामने आता है, तो जवाबदेही का पहिया अचानक धीमा क्यों पड़ जाता है?
क्या विभाग में कार्रवाई का डंडा केवल छोटे कर्मचारियों के लिए है और बड़े अधिकारियों के लिए जांच, स्पष्टीकरण तथा फाइलों का लंबा इंतजार?
यह सवाल अब सीधे उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन के शीर्ष प्रबंधन से पूछा जाना चाहिए।
🔴 पूर्वांचल डिस्कॉम ने दिखाई सख्ती, ₹10.34 लाख की वसूली!
पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड में ट्रांसफार्मर क्षतिग्रस्त होने और रखरखाव में कथित लापरवाही के मामलों में कार्रवाई का उदाहरण सामने आया है। 22 जून 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, एक अधिशासी अभियंता और दो एसडीओ के वेतन से कुल लगभग ₹10.34 लाख की वसूली निर्धारित की गई थी।
- अधिशासी अभियंता अभिषेक सिंह यादव से ₹7.46 लाख की वसूली।
- एसडीओ आनंद सिंह से ₹29,777 की वसूली।
- एसडीओ अभिषेक कुमार मौर्य से लगभग ₹2.61 लाख की वसूली।
इसके अलावा ट्रांसफार्मर क्षतिग्रस्त होने के मामलों में अन्य अभियंताओं को भी नोटिस जारी किए जाने की खबर सामने आई थी।
यानी विभाग ने स्पष्ट संदेश दिया कि ट्रांसफार्मर की सुरक्षा और रखरखाव में लापरवाही पर आर्थिक जवाबदेही तय हो सकती है।
अब सवाल लखनऊ से है—जब पूर्वांचल में वेतन से लाखों रुपये की वसूली हो सकती है, तो लखनऊ में बड़े स्तर पर बिजली आपूर्ति प्रभावित होने के मामले में भी वैसी ही निष्पक्ष जांच क्यों नहीं होनी चाहिए?
🔴 56 मिनट का ब्लैकआउट! 569 भार का मामला आखिर दबा क्यों है?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, लखनऊ में लगभग 56 मिनट तक बिजली आपूर्ति बाधित रहने से कई बिजलीघरों के ब्लैकआउट होने का मामला सामने आया है।
इस प्रकरण में अधीक्षण अभियंता (प्लानिंग एवं वाणिज्य), शक्ति भवन, लखनऊ की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि इस व्यवधान के दौरान 569 भार से संबंधित वित्तीय एवं राजस्व नुकसान का मामला है।
अब विभाग को बताना चाहिए:
- 569 का आंकड़ा आखिर किस इकाई में है?
- कितने बिजलीघरों की आपूर्ति प्रभावित हुई?
- कितने मेगावाट या एमवीए का लोड प्रभावित हुआ?
- 56 मिनट में कितनी यूनिट बिजली की आपूर्ति बाधित हुई?
- विभाग को वास्तविक वित्तीय नुकसान कितना हुआ?
- इस मामले में जिम्मेदार अधिकारी कौन है?
- क्या किसी अधिकारी से जवाब-तलब किया गया?
आखिर यह कौन-सा प्रशासनिक न्याय है कि एक ट्रांसफार्मर खराब होने पर कर्मचारी की तनख्वाह से वसूली हो सकती है, लेकिन कई बिजलीघरों की आपूर्ति बाधित होने के मामले में जिम्मेदारी तय करने का इंतजार करना पड़ता है?
🔴 अधिशासी अभियंता आलोक आनंद पर उठे सवाल, विभाग की चुप्पी पर भी सवाल!
विद्युत प्रेषण खंड-प्रथम, लखनऊ में तैनात अधिशासी अभियंता आलोक आनंद को लेकर पूर्व में प्रकाशित समाचार रिपोर्ट ने भी ऊर्जा विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए थे।
रिपोर्ट में लंबे समय से एक ही स्थान पर तैनाती, कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच और पद पर बने रहने को लेकर सवाल उठाए गए।
220 केवी जीआईएस नादरगंज, कानपुर रोड सहित अन्य उपकेंद्रों की आपूर्ति और ट्रांसफार्मर ट्रिपिंग से जुड़े मुद्दे भी प्रकाशित रिपोर्ट में उठाए गए थे।
सवाल यह है कि इन शिकायतों की जांच कहां तक पहुंची? क्या किसी अधिकारी ने जांच की जिम्मेदारी ली? क्या शिकायतों पर निष्पक्ष निर्णय हुआ?
यदि आरोपों में तथ्य हैं तो कार्रवाई होनी चाहिए और यदि आरोप निराधार हैं तो अधिकारी को भी विभागीय जांच के माध्यम से क्लीन चिट मिलने का अवसर मिलना चाहिए।
लेकिन शिकायतों को लंबित रखकर व्यवस्था पर उठ रहे सवालों को समाप्त नहीं किया जा सकता।
🔴 विभाग के दो चेहरे? एक तरफ निलंबन, दूसरी तरफ इंतजार!
ऊर्जा विभाग की कार्रवाई के कुछ उदाहरण देखिए:
पहला मामला – ट्रांसफार्मर बदलने में देरी: मैनपुरी में जेई के निलंबन की खबर प्रकाशित हुई।
दूसरा मामला – ट्रांसफार्मर क्षतिग्रस्त: मेरठ में पांच अभियंताओं के निलंबन की खबर सामने आई।
तीसरा मामला – पूर्वांचल डिस्कॉम: अभियंताओं के वेतन से ₹10.34 लाख की वसूली का आदेश प्रकाशित हुआ।
चौथा मामला – लखनऊ: 56 मिनट के ब्लैकआउट और 569 भार से जुड़े नुकसान का मामला सामने है, लेकिन इसकी तकनीकी इकाई, वास्तविक वित्तीय क्षति और जिम्मेदारी तय करने की आधिकारिक स्थिति अब भी स्पष्ट होनी चाहिए।
इन मामलों की परिस्थितियां अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन एक सिद्धांत सभी पर लागू होना चाहिए—जांच निष्पक्ष हो और दोष सिद्ध होने पर कार्रवाई पद देखकर नहीं, प्रमाण देखकर हो।
🔥 UPPCL चेयरमैन और एमडी से सीधे सवाल!
1. क्या लखनऊ के 56 मिनट के ब्लैकआउट की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई गई?
2. 569 भार का वास्तविक अर्थ और उससे संबंधित वित्तीय नुकसान कितना है?
3. अधीक्षण अभियंता (प्लानिंग एवं वाणिज्य) की भूमिका की जांच किस अधिकारी ने की?
4. क्या संबंधित अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा गया?
5. पूर्वांचल डिस्कॉम में जिस तरह वेतन से वसूली हुई, क्या यहां भी दोष सिद्ध होने पर समान नियम लागू होंगे?
6. अधिशासी अभियंता आलोक आनंद से जुड़े प्रकाशित आरोपों की जांच की वर्तमान स्थिति क्या है?
7. क्या UPPCL प्रबंधन इस पूरे प्रकरण की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने का साहस दिखाएगा?
हमारी मांग: कार्रवाई हो तो सब पर एक समान!
UPPCL MEDIA की मांग है कि:
- 56 मिनट के ब्लैकआउट की उच्चस्तरीय जांच हो।
- 569 भार की तकनीकी इकाई स्पष्ट की जाए।
- वास्तविक राजस्व नुकसान का आधिकारिक आकलन सार्वजनिक किया जाए।
- अधीक्षण अभियंता से लेकर संबंधित अधिशासी अभियंता तक सभी की भूमिका की निष्पक्ष जांच हो।
- दोष सिद्ध होने पर वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ भी नियमानुसार वेतन वसूली, निलंबन अथवा अन्य अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
- जांच में किसी भी अधिकारी को पद या प्रभाव के आधार पर संरक्षण न मिले।
⚡ अंतिम सवाल: छोटे कर्मचारियों के लिए कानून सख्त, बड़े अधिकारियों के लिए नरम क्यों?
ऊर्जा विभाग में यदि एक जेई की लापरवाही पर निलंबन हो सकता है, एसडीओ के वेतन से वसूली हो सकती है और एक्सईएन को आर्थिक जवाबदेही देनी पड़ सकती है, तो बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों को भी उसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
जनता को इस बात से कोई मतलब नहीं कि गलती करने वाला अधिकारी किस पद पर बैठा है। जनता को बिजली चाहिए, विभाग को राजस्व चाहिए और सरकार को जवाबदेह व्यवस्था चाहिए।
अधिकारी छोटा हो या बड़ा, सरकारी नुकसान की जिम्मेदारी तय होनी ही चाहिए।
और अगर पूर्वांचल डिस्कॉम में ₹10.34 लाख की वसूली का आदेश जारी हो सकता है, तो लखनऊ के इस प्रकरण की निष्पक्ष जांच से परहेज क्यों?
UPPCL चेयरमैन और एमडी साहब! सवाल सीधा है—क्या ऊर्जा विभाग में कार्रवाई का कानून सबके लिए एक है या बड़े पदों के लिए अलग किताब रखी गई है?
लापरवाही समान तो कार्रवाई भी समान!
कुर्सी बड़ी हो सकती है, जवाबदेही नहीं!
विशेष रिपोर्ट: UPPCL MEDIA
ऊर्जा क्षेत्र की खबरें, जनता के सवाल और व्यवस्था की जवाबदेही।
यदि कोई खबर शिकायत से संबंधित है तो, अभी तक का अपडेट
खबर प्रकाशित
1 Nov, 09:19 amपूर्वांचल डिस्कॉम में ₹10.34 लाख की वसूली, ट्रांसफार्मर मामलों में निलंबन की गाज; लखनऊ में 56 मिनट का ब्लैकआउट...
आगे की रिपोर्ट आने पर यहीं जुड़ेगी। अभी समाधान की पुष्टि नहीं हुई है।
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